Sunday, 4 March 2018

राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस


विवरण:: भारत में प्रति वर्ष 4 मार्च को राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस मनाया जाता है। इसी दिन से ही एक सप्ताह तक चलने वाला सुरक्षा अभियान भी शुरू हो जाता है।
स्थापना 4 मार्च, 1966 को राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की स्थापना हुई थी।देशभारत
उद्देश्य: कार्यस्थलों पर सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए पूरे देश में राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस मनाया जाता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस (अंग्रेज़ी:National Safety Day) भारत में प्रति वर्ष 4 मार्च को मनाया जाता है। इसी दिन से ही एक सप्ताह तक चलने वाला सुरक्षा अभियान भी शुरू हो जाता है। कार्यस्थलों पर सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए पूरे देश में राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस मनाया जाता है।
स्थापना
4 मार्च, 1966 को राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की स्थापना हुई थी और इस अवसर पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने औद्योगिक सुरक्षा के लिए व्यापक चेतना जगाने का उद्घोष किया था। इसके पूर्व सन् 1965 में विज्ञान भवन में आयोजित राष्ट्रपति की प्रथम औद्योगिक सुरक्षा संगोष्ठी में उन्होंने कहा था- “Our own constitution puts it down as a directive that we must provide safe and humane conditions of work, for our industrial workers. We should do our outmost to see that conditions of life for them are adequate and they are looked after well. There must be an integration between the management and labour.” उस संगोष्ठी के अंत में जो सिद्धांत प्रतिपादित किया गया वह था- “Safety is as responsibility of management with active co-operation of workers and with the sanction and support of the Government.”
जन आंदोलन
उन्होंने औद्योगिक सुरक्षा को एक नई दिशा दी जिसमें यह स्पष्ट हुआ कि सुरक्षा प्रबंधन की जिम्मेदारी तो है, लेकिन उसमें सबका सम्मिलित सहयोग चाहिये। इसके पूर्व स्थिति वैसी नहीं थी। न केवल अपने देश में बल्कि उन्नीसवीं सदी में पाश्चात्य देशों में सुरक्षा के प्रति व्यक्ति की सोच स्पष्टत: विकसित नहीं हुई थी। लोग भाग्य या ईश्वर पर दुर्घटना के कारणों को थोप देते थे और निश्चिंत हो जाते थे। बाद में शिक्षा के प्रचार प्रसार से अनेक जन आंदोलन हुए। लोगों ने अपने अधिकार एवं कर्तव्यों के बारे में सोचा और अंतत: 1930 में एक जर्मन वैज्ञानिक एच. डब्ल्यू . हेनरिच ने उद्घोष किया - “दुर्घटना होती नहीं , की जाती है। यह हठात् नहीं होती – घटनाक्रम से अंतत: इस रूप में परिणत होती है। असुरक्षित परिवेश और असुरक्षित कार्य इसके लिए जिम्मेदार हैं। आदमी की आंतरिक-वैचारिक त्रुटियों को दूर करने के लिए प्रशिक्षण दो, कानून बनाओ और ऐसी तकनीक अपनाओ जो आदमी की गलती को भी रोके या उसे अंतिम परिणाम तक नहीं पहुँचने दे।” पूरे विश्व के लोग हेनरिच के इस सिद्धांत से चौंके, भारत के लोग भी। इसके पूर्व भारत में हीं नहीं बल्कि अन्य देशों में भी यह माना जाता था कि दुर्घटना मात्र संयोग है, जो होना होगा वही होगा या जो ईश्वर की इच्छा होगी वही होगा- उसके अधिक कुछ नहीं होगा। हेनरिच के विचारों से चिंतन में परिवर्तन हुआ। जो उसने कहा था कि कुछ कारण ऐसे हैं जो दिखाई नहीं देते, कुछ ऐसे हैं जो प्रत्यक्ष दिखाई पड़ते हैं। हमें गहराई में जाना पड़ेगा और दुर्घटना के मूल कारणों को खोजना होगा। जब यह भावना जगी कि दुर्घटना में हमारा हाथ है, हम ही असुरक्षित कार्वविधि एवं असुरक्षित परिस्थितियों को पैदा करते हैं तो हम इसे दूर भी कर सकते हैं ,यदि उन परिस्थितियों को दूर कर लें या मानवीय भूलों को सुधार लें।
इसके साथ ही हेनरिच ने कहा था कि कोई दुर्घटना हठात् नहीं होती, बल्कि क्रमश: घटनाक्रम से आगे बढ़ती है। वह हमारे व्यक्तित्व से व्यवहार से आगे बढ़ती है। यदि घटनाक्रम को कहीं काट दिया जाए तो दुर्घटना और चोट से बचा जा सकता है। 

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